श्राद्ध और तर्पण क्यों अत्यंत अनिवार्य हैं, कारण और निवारण?

श्राद्ध और तर्पण क्यों अत्यंत अनिवार्य हैं, कारण और निवारण?

हमारी भारतीय संस्कृति में मृत्यु के साथ जीवन समाप्त नहीं होता, अनन्त जीवन शृंखला की एक कड़ी मृत्यु भी है, हमलोग मृत्यु लोक में जन्म लिए है। इसलिए संस्कारों के क्रम में जीव की उस स्थिति को भी बाँधा गया है। जब वह एक जन्म पूरा करके अगले जीवन की ओर उन्मुख होता है, तब कामना की जाती है कि सम्बन्धित जीवात्मा का अगला जीवन पिछले की अपेक्षा अधिक सुसंस्कारवान् बने। इस निमित्त जो कर्मकाण्ड किये जाते हैं, उनका लाभ जीवात्मा को क्रिया- कर्म करने वालों की श्रद्धा के माध्यम से ही मिलता है। इसलिए मरणोत्तर संस्कार को श्राद्धकर्म भी कहा जाता है। हर मनुष्य को इनसे बंध के रहना पड़ता है।

कारण – पितृ दोष के घर मे लक्षण।

घर में पितृ दोष होने पर अक्सर बीमारियाँ और दुर्घटनाएँ होती हैं, परिवार में क्लेश और असहमति बनी रहती है, विवाह में बाधा आती है, संतान सुख मिलने में देरी होती है या संतान विकलांग हो सकती है, संतान की गलत संगति, व्यभिचार, नशा, काम और व्यवसाय में भारी नुकसान होता है। घर में मृत्यु होना या मृत्यु का भय बना रहना। 

इन लक्षणों के अलावा, घर के आँगन या छत में पीपल के पौधे का अचानक उगना, कौवों का लगातार भोजन के लिए आना, और परिवार के सदस्यों के बीच हमेशा झगड़े होना भी पितृ दोष की ओर संकेत करते हैं।

पितरों की पूजा का महत्व।

समयनुसार श्राद्ध करने से कुल में कोई दुखी नही रहता। पितरों की पूजा से मनुष्य, आयु, पुत्र, यश, कीर्ति, स्वर्ग, पुष्टि, बल, श्री, शुख-सौभाग्य और धन-धान्य प्राप्त करता है। देवकार्य से भी पितृकार्य का विशेष महत्व है। देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी है। 

पितृ दोष के लक्षण।

पारिवारिक और भावनात्मक परेशानियाँ।

० घर में लगातार कलह और झगड़े होते हैं, जिससे मानसिक शांति नहीं मिलती। 
० परिवार के सदस्य आपस में बात नहीं करते और एक-दूसरे की बात नहीं सुनते। 
० घर के लोगों को लगातार तनाव और चिंता बनी रहती है।

स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ।

० परिवार में कोई न कोई सदस्य हमेशा बीमार रहता है।
० बच्चों को लगातार स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ होती हैं।
० बार-बार दुर्घटनाएँ और चोट लगने की घटनाएँ होती हैं।

आर्थिक और व्यावसायिक बाधाएँ।

० व्यवसाय या नौकरी में लगातार घाटा होता है और तरक्की रुक जाती है।
० हर तरह के काम बनते-बनते बिगड़ जाते हैं और पैसा कहीं टिकता नहीं है। 

विवाह और संतान संबंधी बाधाएँ।

० विवाह में देरी होती है या कई बार तय होते-होते रिश्ता टूट जाता है। 
० संतान प्राप्ति में बाधा आती है।
० यदि संतान होती भी है, तो बच्चा विकलांग हो सकता है या उसकी अचानक मृत्यु हो सकती है।
० संतान के होने पे भी खराब निकलना, व्यभिचार, नशा, बुरी संगति होना। 
० संतान का बात ना मानना, मना करने पे हमेशा गलत कार्य करना। 
० संतान का माता पिता को अप्सब्द बोलना या मारपीट पे उतारू हो जाना, या मारपीट करना, या घर छोड़ना। 

घर में दिखने वाले संकेत।

० घर के आंगन, छत या टूटे गमलों में पीपल का पौधा उगना।
० कौवे रोजाना एक ही समय पर भोजन के लिए खिड़की या छत पर कांव-कांव करते हुए लौटते हैं। 
० घर में लगातार नकारात्मक ऊर्जा महसूस होती है। 
० घर मे किसी के रहने या चलने का आभास या संकेत होना। 
० घर मे मृत्यु लगातार होना, या मृत्यु का भय बना रहना। 
० मरने का मन करना या आत्महत्या या आत्महत्या करने का मन मे बार बार विचार आना। 
० हमेशा नकारात्मक बाते करना या सोचना।

निवारण – पितृदोष का निवारण श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान।

श्राद्ध और तर्पण पितरों (पूर्वजों) के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा व्यक्त करने, उनकी आत्मा को शांति और सद्गति दिलाने तथा उनके आशीर्वाद से परिवार में सुख-समृद्धि लाने के लिए अनिवार्य हैं। पितृपक्ष के दौरान पितरों को तर्पण किया जाता है, जिसमें जल में तिल और जौ मिलाकर उन्हें अर्पण किया जाता है। इसके अलावा, श्राद्ध कर्म के रूप में ब्राह्मणों/कन्याओं/गाय/गरीब/असहाय/बीमार लोगो को भोजन कराने, दान-पुण्य करने या वृक्षारोपण जैसे लोक-कल्याणकारी कार्य करने का विधान है, जो पितृऋण चुकाने और सामाजिक जिम्मेदारी निभाने का एक प्रभावी तरीका है।

माता-पिता और पूर्वजों के ऋण को उतारना हर संतान का कर्तव्य है। श्राद्ध के माध्यम से यह ऋण आंशिक रूप से चुकता होता है। पौराणिक मान्यता है कि जो लोग पितरों का श्राद्ध नहीं करते, उन्हें जीवन में बाधाओं और कष्टों का सामना करना पड़ सकता है। 

जीवन भर माता पिता की सेवा करना, उनके जाने के बाद, वो पितृ हो जाते है, जो मनुष्य के वंसज की एक कड़ी है, उनके ही माध्यम से हम पृथ्वी पे आये और जीवन व्यतीत कर रहे है। इसलिए हमें हमेशा अपने माता पिता पितरों को जल अर्पण और तर्पण करना चाहिये।

श्राद्ध क्या है?

श्राद्ध को पितरों के लिए श्रद्धा से किया गया मुक्ति कर्म है। पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता अभिव्यक्त करने तथा उन्हें याद करना। 

तर्पण क्या है?

तर्पण, जल में काले तिल, दूध, दही, शहद, फूल, चावल और जौ मिश्रित करके, दक्षिण दिशा विमुख होके, जल को अर्पण करना। जो पितरों, देवताओं और ऋषियों को तृप्त करता है।

नियमित जल देने का नियम।

तर्पण, जल में काले तिल और जौ मिश्रित करके, दक्षिण दिशा विमुख होके, जल को अर्पण करना। जो पितरों, देवताओं और ऋषियों को तृप्त करता है।

तर्पण का मंत्र।

ओम पितृभ्यो नमः तर्पयामि।।

तर्पण किनके लिए किया जाता है, कैसे करते है, किस दिशा में करते हैं?

1. देव तर्पण (पहला)

०  देव शक्तियाँ ईश्वर की वे महान् विभूतियाँ हैं, जो मानव- कल्याण में सदा निःस्वार्थ भाव से प्रयत्नरत हैं। जल, वायु, सूर्य, अग्नि, चन्द्र, विद्युत् तथा अवतारी ईश्वर अंगों की मुक्त आत्माएँ एवं विद्या, बुद्धि, शक्ति, प्रतिभा, करुणा, दया, प्रसन्नता, पवित्रता जैसी सत्प्रवृत्तियाँ सभी देव शक्तियों में आती हैं। यद्यपि ये दिखाई नहीं देतीं, तो भी इनके अनन्त उपकार हैं। यदि इनका लाभ न मिले, तो मनुष्य के लिए जीवित रह सकना भी सम्भव न हो। इनके प्रति कृतज्ञता की भावना व्यक्त करने के लिए यह देव- तर्पण किया जाता है।

० यह पूर्वभिमुख दिशा में किया जाता है।
० यह दोनों हाथ की अंगुलियों के अग्र भाग से इसमें जल देते हैं। अंजलि में जल भरकर सभी अँगुलियों के अग्र भाग के सहारे जल अर्पित करें। 
० इसे देवतीर्थ मुद्रा कहते हैं।
० जनेऊ बाए कंधे पे रहता है, जैसे आप पहनते हैं।

2. ऋषि तर्पण (दूसरा)

दूसरा तर्पण ऋषियों के लिए है। व्यास, वशिष्ठ, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, नारद, चरक, सुश्रुत, पाणिनि, दधीचि आदि ऋषियों के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति ऋषि तर्पण द्वारा की जाती है। ऋषियों को भी देवताओं की तरह देवतीर्थ से एक- एक अंजलि जल दिया जाता है।

० यह पूर्व दिशा में किया जाता है।
० यह दोनों हाथ की अंगुलियों के अग्र भाग से इसमें जल देते हैं। ऋषियों को भी देवताओं की तरह देवतीर्थ से एक-एक अंजलि जल दिया जाता है।
० इसे देवतीर्थ मुद्रा कहते हैं।
० जनेऊ कण्ठ की माला की तरह रखें।

3. दिव्य मानव तर्पण (तीसरा)

० तीसरा तर्पण दिव्य मानवों के लिए है। जो पूर्ण रूप से समस्त जीवन को लोक कल्याण के लिए अर्पित नहीं कर सकें, पर अपना, अपने परिजनों का भरण- पोषण करते हुए लोकमंगल के लिए अधिकाधिक त्याग- बलिदान करते रहे, वे दिव्य मानव हैं। राजा हरिशचन्द्र, रन्तिदेव, शिवि, जनक, पाण्डव, शिवाजी, प्रताप, भामाशाह, तिलक जैसे महापुरुष इसी श्रेणी में आते हैं।
० दिव्य मनुष्य तर्पण उत्तराभिमुख किया जाता है ।
० यह दोनों हाथ मध्य भाग से जल दिया जाता है। अंजलि में जल भरकर कनिष्ठा (छोटी उँगली) की जड़ के पास से जल छोड़ें, प्रत्येक सम्बोधन के साथ दो-दो अंजलि जल दें।
० इसे प्राजापत्य तीर्थ मुद्रा कहते हैं। 
० जनेऊ बाए कंधे पे रहता है, जैसे आप पहनते हैं।

4. दिव्य पितृ तर्पण (चौथा)

० चौथा तर्पण दिव्य पितरों के लिए है। जो कोई लोकसेवा एवं तपश्चर्या तो नहीं कर सके, पर अपना चरित्र हर दृष्टि से आदर्श बनाये रहे, उस पर किसी तरह की आँच न आने दी। अनुकरण, परम्परा एवं प्रतिष्ठा की सम्पत्ति पीछे वालों के लिए छोड़ गये। ऐसे लोग भी मानव मात्र के लिए वन्दनीय हैं, उनका तर्पण भी ऋषि एवं दिव्य मानवों की तरह ही श्रद्धापूर्वक करना चाहिए।० इसके लिए दक्षिणाभिमुख हों। वामजानु या हनुमान मुद्रा (बायाँ घुटना मोड़कर बैठें) 
० जनेऊ अपसव्य (दाहिने कन्धे पर सामान्य से उल्टी स्थिति में) रखें।  
० अंजलि में जल लेकर दाहिने हाथ के अँगूठे के सहारे जल गिराए। 
० इसे पितृ तीर्थ मुद्रा कहते हैं। 
० प्रत्येक पितृ को तीन- तीन अंजलि जल दें।

5. यम तर्पण (पांचवा)

० यम नियन्त्रण- कर्त्ता शक्तियों को कहते हैं। जन्म- मरण की व्यवस्था करने वाली शक्ति को यम कहते हैं। मृत्यु को स्मरण रखें, मरने के समय पश्चात्ताप न करना पड़े, इसका ध्यान रखें और उसी प्रकार की अपनी गतिविधियाँ निर्धारित करें, तो समझना चाहिए कि यम को प्रसन्न करने वाला तर्पण किया जा रहा है। राज्य शासन को भी यम कहते हैं। अपने शासन को परिपुष्ट एवं स्वस्थ बनाने के लिए प्रत्येक नागरिक को, जो कर्तव्य पालन करता है, उसका स्मरण भी यम तपर्ण द्वारा किया जाता है। अपने इन्द्रिय निग्रहकर्त्ता एवं कुमार्ग पर चलने से रोकने वाले विवेक को यम कहते हैं। इसे भी निरंतर पुष्ट करते चलना हर भावनाशील व्यक्ति का कर्तव्य है। इन कर्तव्यों की स्मृति यम- तर्पण द्वारा की जाती है। 
० दिव्य पितृ तर्पण की तरह पितृतीर्थ से तीन- तीन अंजलि जल यमों को भी दिया जाता है ।
० इसके लिए दक्षिणाभिमुख हों। वामजानु (बायाँ घुटना मोड़कर बैठें) 
० जनेऊ अपसव्य (दाहिने कन्धे पर सामान्य से उल्टी स्थिति में) रखें।  
० अंजलि में जल लेकर दाहिने हाथ के अँगूठे के सहारे जल गिराए। 
० इसे पितृ तीर्थ मुद्रा कहते हैं। 
० प्रत्येक पितृ को तीन- तीन अंजलि जल दें।

6. मनुष्य पितृ तर्पण (छठा)

मनुष्य- पितृ

० इसके बाद अपने परिवार से सम्बन्धित दिवंगत नर- नारियों का क्रम आता है।
१- पिता, बाबा, परबाबा, माता, दादी, परदादी।
२- नाना, परनाना, बूढ़े नाना, नानी परनानी, बूढ़ीनानी।
३- पत्नी, पुत्र, पुत्री, चाचा, ताऊ, मामा, भाई, बुआ, मौसी, बहिन, सास, ससुर, गुरु, गुरुपत्नी, शिष्य, मित्र आदि।
यह तीन वंशावलियाँ तर्पण के लिए है। 
० पहले स्वगोत्र तर्पण किया जाता है।

द्वितीय गोत्र तर्पण

० इसके बाद द्वितीय गोत्र मातामह आदि का तर्पण करें। यहाँ यह भी पहले की भाँति निम्नलिखित वाक्यों को तीन- तीन बार पढ़कर तिल सहित जल की तीन- तीन अंजलियाँ पितृतीर्थ से दें।

इतर तर्पण

० जिनको आवश्यक है, केवल उन्हीं के लिए तर्पण कराया जाए।
० शुद्ध वस्त्र जल में डुबोएँ और बाहर लाकर मन्त्र को पढ़ते हुए अपसव्य भाव से अपने बायें भाग में भूमि पर उस वस्त्र को निचोड़ें (यदि घर में किसी मृत पुरुष का वार्षिक श्राद्ध कर्म हो, तो वस्त्र- निष्पीड़न नहीं करना चाहिए ।)

भीष्म तर्पण

अन्त में भीष्म तर्पण किया जाता है। ऐसे परमार्थ परायण महामानव, जिन्होंने उच्च उद्देश्यों के लिए अपना वंश चलाने का मोह नहीं किया, भीष्म उनके प्रतिनिधि माने गये हैं, ऐसी सभी श्रेष्ठात्माओं को जलदान दें।

देवार्घ्यदान

भीष्म तर्पण के बाद सव्य होकर पूर्व दिशा में मुख करें। अञ्जलि में जल भरकर प्रत्येक मन्त्र के साथ जलधार अँगुलियों के अग्रभाग से चढ़ाएँ और नमस्कार करें। भावना करें कि अपनी भावश्रद्धा को इन असीम शक्तियों में घूमते हुए आन्तरिक विकास की भूमिका बना रहे ।।

० प्रथम अर्घ्य सृष्टि निर्माता ब्रह्मा को। 
० दूसरा अर्घ्य पोषणकर्त्ता भगवान् विष्णु को।
० तीसरा अघ्यर् अनुशासन- परिवर्तन के नियन्ता शिव रुद्र महादेव को। 
० चौथा अर्घ्य भूमण्डल के चेतना- केन्द्र सवितादेव सूर्य को। 
० पाँचवाँ अर्घ्य प्रकृति का सन्तुलन बनाये रखने वाले देव- मित्र के लिए।
० छठवाँ अर्घ्य तर्पण के माध्यम से वरुणदेव के लिए।

घर मे तर्पण कैसे करें।

० दक्षिण दिशा की ओर मुख करें।
० कुश को दाहिने हाथ की अनामिका अंगुली में पहने।
० हाथ से तीन बार अंजली में जल लेकर पितरों का स्मरण करते हुए उसे नीचे धरती पर या उस लोटे में गिराएँ, अंगुष्ठ के सहारे।
० प्रत्येक बार जल अर्पण करते हुए ‘ओम पितृभ्यो नमः तर्पयामि ।।‘ मंत्र का जाप करें।

श्राद्ध और तर्पण क्यों अनिवार्य हैं?

  • पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञताश्राद्ध और तर्पण पूर्वजों के प्रति अपनी श्रद्धा और उन उपकारों को याद करने का एक तरीका है, जो उन्होंने हमारे जीवन पर किए हैं।

पितरों की आत्मा की शांति और सद्गति

इन अनुष्ठानों से पितरों की आत्माओं को शांति मिलती है, जिससे उन्हें मोक्ष या मुक्ति की प्राप्ति होती है।

पारिवारिक सुख-समृद्धि

पुर्वजो की कृपा से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि आती है।

पितृऋण चुकाना

श्राद्ध कर्म एक प्रकार से पितृऋण चुकाने का भी जरिया है, जो हमें अपने पूर्वजों से मिलता है।

सच्चा श्राद्ध लोक-कल्याण है

असली श्राद्ध केवल ब्राह्मण भोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपने साधनों का कुछ हिस्सा लोक-कल्याण में लगाना भी है।

वृक्षारोपण एक उत्तम कर्म

पितृ लोगों को वृक्ष लगाने की प्रेरणा देते हैं, क्योंकि वृक्ष पर्यावरण की रक्षा करते हैं, छाया देते हैं और प्राणियों की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। इसे भोजन कराने से भी अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। वृक्षारोपण से पितरों की यादे और सीख जीवन भर याद रहती है।

गौ सेवा और अन्य दान

लोगों को गौ सेवा करने और दान-पुण्य जैसे कार्यों में भी संलग्न होना चाहिये। 

पिण्ड दान क्यो करना चाहिए।

पितृयज्ञ यह कृत्य पितृयज्ञ के अंतर्गत किया जाता है। जिस प्रकार तर्पण में जल के माध्यम से अपनी श्रद्धा व्यक्त की जाती है, उसी प्रकार हविष्यान्न के माध्यम से अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति की जानी चाहिए। मरणोत्तर संस्कार में १२ पिण्डदान किये जाते हैं- जौ या गेहूँ के आटे में तिल, शहद, घृत, दूध मिलाकर लगभग एक- एक छटाँक आटे के पिण्ड बनाकर एक पत्तल पर रख लेने चाहिए। संकल्प के बाद एक- एक करके यह पिण्ड जिस पर रखे जा सकें, ऐसी एक पत्तल समीप ही रख लेनी चाहिए। छः तर्पण जिनके लिए किये गये थे, उनमें से प्रत्येक वर्ग के लिए एक- एक पिण्ड है। सातवाँ पिण्ड मृतात्मा के लिए है। अन्य पाँच पिण्ड उन मृतात्माओं के लिए हैं, जो पुत्रादि रहित हैं, अग्निदग्ध हैं, इस या किसी जन्म के बन्धु हैं, विच्छिन्न कुल, वंश वाले हैं, उन सबके निमित्त ये पाँच पिण्ड समर्पित हैं। 

ये बारहों पिण्ड पक्षियों के लिए अथवा गाय के लिए किसी उपयुक्त स्थान पर रख दिये जाते हैं। मछलियों को चुगाये जा सकते हैं ।

पिण्डदान

पिण्ड दाहिने हाथ में लिया जाए। मन्त्र के साथ पितृतीर्थ मुद्रा से दक्षिणाभिमुख होकर पिण्ड किसी थाली या पत्तल में क्रमशः स्थापित करें।

१- प्रथम पिण्ड देवताओं के निमित्त। 

२- दूसरा पिण्ड ऋषियों के निमित्त। 

३- तीसरा पिण्ड दिव्य मानवों के निमित्त। 

४- चौथा पिण्ड दिव्य पितरों के निमित्त। 

५- पाँचवाँ पिण्ड यम के निमित्त। 

६- छठवाँ पिण्ड मनुष्य- पितरों के निमित्त। 

७- सातवाँ पिण्ड मृतात्मा के निमित्त। 

८- आठवाँ पिण्ड पुत्रदार रहितों के निमित्त। 

९- नौवाँ पिण्ड अविच्छिन्न कुलवंश वालों के निमित्त।

१०- दसवाँ पिण्ड गर्भपात से मर जाने वालों के निमित्त। 

११- ग्यारहवाँ पिण्ड इस जन्म या अन्य जन्म के बन्धुओं के निमित्त। 

१२- बारहवाँ पिण्ड इस जन्म या अन्य जन्म के बन्धुओं के निमित्त या स्वय के निमित्त। 

पिण्ड समर्पण के बाद पिण्डों पर क्रमशः दूध, दही और मधु चढ़ाकर पितरों से तृप्ति की प्रार्थना की जाती है।

भूतयज्ञ- पञ्चबलि

पंचबलि में पांच जगह भोजन का दान करते है। पंचबली का अर्थ है ‘पांच प्रकार की भेंट’। 

1. पितरों को प्रसन्न करने के लिए यह भेंट दी जाती है। (ब्राह्मणों/कन्याओं/गाय/गरीब/असहाय/बीमार लोगो को भोजन, किसी को भी) 

2. इसमें गाय का भोग, 

3. पिपीलिका (चींटियों) का भोग, 

4. कुत्ते का भोग, 

5. कौओं का भोग और अन्य छोटे जीवों का भोग शामिल होता है। 

भूतयज्ञ के निमित्त पञ्चबलि प्रक्रिया की जाती है। विभिन्न योनियों में संव्याप्त जीव चेतना की तुष्टि हेतु भूतयज्ञ किया जाता है। अलग- अलग पत्तो या एक ही बड़ी पत्तल पर, पाँच स्थानों पर भोज्य पदार्थ रखे जाते हैं। उरद- दाल की टिकिया तथा दही इसके लिए रखा जाता है। पाँचों भाग रखें। 

१. गोबलि- पवित्रता की प्रतीक गऊ के निमित्त।

२. कुक्कुरबलि- कत्तर्व्यष्ठा के प्रतीक श्वान के निमित्त।

३. काकबलि- मलीनता निवारक काक के निमित्त।

४. देवबलि- देवत्व संवधर्क शक्तियों के निमित्त।

५. पिपीलिकादिबलि- श्रमनिष्ठा एवं सामूहिकता की प्रतीक चींटियों के निमित्त। 

बाद में गोबलि गऊ को, कुक्कुरबलि श्वान को, काकबलि पक्षियों को, देवबलि कन्या को तथा पिपीलिकादिबलि चींटी आदि को खिला दिया जाए।

अगर आप नहीं कर पा रहे किसी भी कारण से, तो किसी भी गरीब व्यक्ति को खाना खिला दे और पांच जगह थोड़ा सा खाना निकाल के पीपल या किसी पेड़ के निचे रख दे।

क्या लड़कियां पितृ तर्पण कर सकती हैं?

हाँ, एकदम कर सकती हैं। प्राचीन काल से ही  लडकिया/महिलाएं तर्पण करती आ रही हैं।

माता सीताजी ने महान राजा दशरथ के लिए तर्पण किया, गया जी मे। (बाल्मीकि रामायण)

पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने (1926) से ही लड़कियों को वेद पढ़ने और श्राद्ध तर्पण का ज्ञान दिये।

युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य (1942) से ही इस कार्य को शुरू कराया।

सत्गुरु वेंकटरमन ने 1980 के दशक में यह विचार दिये थे।

मनुष्ययज्ञ श्राद्ध संकल्प

पिण्डदान इसके अन्तर्गत दान का विधान है। दिवंगत आत्मा ने उत्तराधिकार में जो छोड़ा है, उसमें से उतना अंश ही स्वीकार करना चाहिए, जो पीछे वाले बिना कमाऊ बालकों या स्त्रियों के निर्वाह के लिए अनिवार्य हो- कमाऊ सन्तान को उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए। दिवंगत आत्मा के अन्य अहसान ही इतने हैं कि उन्हें अनेक जन्मों तक चुकाना पड़ेगा, फिर नया ऋण भारी ब्याज सहित चुकाने के लिए क्यों सिर पर लादा जाए। असमर्थ स्थिति में अभिभावकों की सेवा स्वीकार करना उचित था, पर जब वयस्क और कमाऊ हो गये, तो फिर उसे लेकर ‘हराम- खाऊ’ मुफ्तखोरों में अपनी गणना क्यों कराई जाए? पूर्वजो के छोड़े हुए धन में कुछ अपनी ओर से श्रद्धाञ्जलि मिलाकर उनकी आत्मा के कल्याण के लिए दान कर देना चाहिए, यही सच्चा श्राद्ध है। पानी का तर्पण और आटे की गोली का पिण्डदान पयार्प्त नहीं, वह क्रिया कृत्य तो मात्र प्रतीक हैं। श्रद्धा की वास्तविक परीक्षा उस श्राद्ध में है कि पूर्वजो की कमाई को उन्हीं की सद्गति के लिए, सत्कर्मो के लिए दान रूप में समाज को वापस कर दिया जाए। अपनी कमाई का जो सदुपयोग, मोह या लोभवश स्वर्गीय आत्मा नहीं कर सकी थी, उस कमी की पूर्ति उसके उत्तराधिकारियों को कर देनी चाहिए ।। प्राचीनकाल में ब्राह्मण का व्यक्तित्व एक समग्र संस्था का प्रतिरूप था। उन्हें जो दिया जाता था, उसमें से न्यूनतम निर्वाह लेकर शेष को समाज की सत्प्रवृत्तियों में खर्च करते थे। अपना निर्वाह भी इसलिए लेते थे कि उन्हें निरन्तर परमार्थ प्रयोजनों में ही लगा रहना पड़ता था। आज वैसे ब्राह्मण नहीं है, इसलिए उनका ब्रह्मभोज भी साँप के चले जाने पर लकीर पीटने की तरह है। दोस्तों- रिश्तेदारों को मृत्यु के उपलक्ष्य में दावत खिलाना मूर्खता और उनका खाना निर्लज्जता है, इसलिए मृतकभोज की विडम्बना में न फँसकर श्राद्धधन परमार्थ प्रयोजन के लिए लगा देना चाहिए, जिससे जनमानस में सद्ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न हो और वे कल्याणकारी सत्पथ पर चलने की प्रेरणा प्राप्त करें, यही सच्चा श्राद्ध है। कन्या भोजन, दीन- अपाहिज, अनाथों को जरूरत की चीजें देना, इस प्रक्रिया के प्रतीकात्मक उपचार हैं। इसके लिए तथा लोक हितकारी पारमार्थिक कार्यों (वृक्षारोपण, विद्यालय निर्माण, अस्पताल (चिकित्सालय), गरीबों के उत्थान के लिए संस्था, विकलांगों की सेवा, गरीब लड़कियों की सहायता और विवाह, स्वरोजगार बनाना, क्षेत्र या देश के हित मे दान, इत्यादि) के लिए दिये जाने वाले दान की घोषणा श्राद्ध संकल्प के साथ की जानी चाहिए।

बहुत से लोग दुविधा में फस जाते है क्या कैसे करे, जिसके कारण यह ज्ञान आपलोगो के सामने समर्पित है, गुरूदेव के आशीर्वाद से।

क्रियान्वयन में मंत्रो की जरूरत पड़ती है, वो आप लोग कहे तो लिख दे, या आपके यहाँ गायत्री परिजन या शुद्ध कर्मकांड करने वाले ब्राह्मण से संपर्क करे। 

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